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वृक्ष की महिमा

 कोंपल से जडो़ं तक, फूलों से फलों तक, एक ही व्यवहार, सिर्फ नि:स्वार्थ त्याग, अपनें जीवन का, हर मौसम,हर ऋतु में, अपने मित्र ह्रदय का अनुराग-सफर, देता अपना सम्पूर्णानन्द... लेकिन, स्वार्थी इंसान, कब किसकी, परवाह करता है, वो , जो झुके उसी की गर्दन काटता है, वृक्ष बड़ा भोला है, त्याग के सिवा, कब किस से कुछ माँगा है, घर के बड़े बुजर्गों की तरह , मिटकर बनाने में , जिन्होंने जीवन गुजार दिया, आज तकलीफ और बेसहारा में, उन्हीं को छोड़ दिया, धक्का बुढा समझकर दे दिया, वृक्ष पुराना समझकर गिरा दिया, बचपन बीता जिनकी छाँव में, बचपन खेला जिनकी चाह में, कोमल कोंपल,कोमल बाँहें, धक्का निष्ठुर, आहत हुई ना, फिर भी उनकी चाहत, मिटते -मिटते आबाद कर गई, वृक्ष की महिमा... बुजर्गों की चाहत... अनंत है... डॉ.अनिल मीणा, मंडावर, अलवर,301407